आजकल वो रहते हैँ थोड़ा व्यस्त,
काम से शायद हो गए कुछ ज्यादा ही पस्त !
पहले भी तो घंटो हम बतियाते थे,
कुछ तुम्हारी सुनते और कुछ अपनी बतिया सुनाते थे
!
पर आजकल बातें होती बहुत ही कम,
हां, हूँ से ज्यादा नहीं या फिर उससे भी कम!
डरते डरते मैं फ़ोन हूँ करती,
हेलो सुनते ही थोड़ा सा फिर डरती!
सामने से आती एक आवाज,
क्या हुआ हैँ कुछ काम!
मैं बोलती, था तो सही पर नहीं हैँ अब ध्यान,
चलो मैं रखती हूँ फिर फ़ोन,
सुनते ही धर लेती मैं इन होंठो पर फिर से मौन!!
फिर मन में एक ख्याल आता, क्या यू ही नहीं कर सकती मैं तुमसे अब बात,
और सुना, तू बता, कुछ नहीं, तू ही सुना,
ये सब सुने हो गया एक जमाना!
होने को तो हैँ बहुत सी दास्ता,
पर शायद तुम्हारे पास नहीं हैँ वक्त,सुनने को अब मेरा कोई भी फसाना!