'क्या करोगी इतना पढ़ लिखकर,लड़की हो संभालना तो चूल्हा चौका ही है ',
ऐसी बातें पुराने जमाने में ही नहीं...अब भी कई जगह सुनने को मिल जाती हैं,फिर भी आज लड़कियां बिना किसी की सुने अपने सपने पूरे करने में लगी है,हर वह चीज कर रही है जो कोई भी इंसान कर सकता है,अपनी सोच को अंजाम दे रही हैं, हर सपना पूरा कर रही हैँ!
आप पेपर में एक घटना पढ़ कर ऐसा लगा कि क्या वास्तव में महिलाओं का काम सच में केवल चूल्हा चौका संभालना ही है! सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई,केस था योग्य महिला वकील को जज क्यों नहीं बनाया गया,पता चला उन वकील महिलाओं ने स्वेच्छा से पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया,इससे बड़ी महानता क्या हो सकती है! सब सोचेंगे हम तो पहले ही कहते थे संभालना तो चुल्हा चौका ही है और इसका उदाहरण ये घटना है! नहीं अगर वह वकील चाहती तो पदभार ग्रहण कर सकती थी पर उन्होंने शिक्षा घर बिखेरने के लिए नहीं, घर सवारने के लिए प्राप्त करी,और इतना पढ़ लिखकर उनकी सोच किस हद तक ऊंची हो गई, वो अच्छे से जानती थी उनके लिए क्या सही है और क्या गलत!इससे उनकी पदवी घटी नहीं बहुत बढ़ गयी!
इससे ही मिलता-जुलता एक वाक्या मुझे याद आया,जो मैंने कभी पढ़ा था, एक बहुत ही ऊंचे पद पर एक महिला ऑफिसर का प्रमोशन हुआ,जब उसका इंटरव्यू हुआ और उससे पूछा आपकी सारी इच्छाएं पूरी हो गई,अभी भी ऐसी कोई इच्छा बची है तो वह बोली,
' मुझे मुझे मेरे घर के लिए एक वाइफ चाहिए,सुनने में अटपटा लगेगा, पर सच में उसको अपने घर के लिए वाइफ चाहिए,क्योंकि उसको पता था उससे अच्छा उसके परिवार को कोई नहीं संभाल सकता, भले वह कितने नौकर चाकर रखे, पर वो निष्ठां कहां से ला पाएंगे!
सच कहा किसी ने महिला होना आसान नहीं होता!