Jindagi ek unsuljhi paheli

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Monday, 29 December 2025

चकचौंध

हाल ही आयी धुरंधर फिल्म ने अक्षय खन्ना की रातों-रात किस्मत पलट कर रख दी l जो नाम, शोहरत,पैसा, इज्जत आज तक वह हीरो बनकर नहीं कमा पाए आज  विलेन बन कर कमा लिया l पिक्चर के हीरो रणवीर सिंह से ज्यादा चर्चे तो अक्षय खन्ना के है l उनके डायलॉग,उनकी एक्टिंग, उनकी डांस स्टाइल हर चीज की तारीफ हो रही है... हो भी क्यों ना अभी उनका वक्त अच्छा है... उनके सितारे बुलंद है तो उनके छूने से अभी पत्थर भी पारस बन रहा है l  आज तक जो उनके नाम को जुबान पर लाना पसंद नहीं करते वही सब एक सुर में कह रहे हैं कि वह तो शुरू से ही टैलेंटेड थे बस उनके हुनर की कदर नहीं हुई या किस्मत का साथ नहीं मिला l सच इस जाते हुए साल ने अक्षय खन्ना के सितारे बदल कर रख दिए l वह ना किसी फ़िल्मी पार्टी में जाते...ना उनकी कोई पी आर टीम है बस वह अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीते हैं और देखो आखिर वक्त ने उनके हुनर की कद्र कर उनको सफलता दिला ही दी वो कहावत है ना "देर आये दुरुस्त आये "l


पर  कहते हैं ना नाम होता हैं तो साथ में और भी कई चीजे आती है अब जलने वालों की भी कोई कमी नहीं होती... अफवाहों का बाजार गर्म होता .. जितने मुंह उतनी बातें l अब  मीडिया में खबर है कि अक्षय खन्ना को "दृश्यम 3" से निकाल दिया l वजह उन्होंने अपनी सफलता को भुनाते हुए अपनी फीस 21 करोड़ कर दी जो बंदा दो से तीन करोड लेता अचानक इतना अंतर l साथ में विग पहनने की शर्त भी रख दी l इसका हश्र क्या हुआ फ़िल्म के डायरेक्टर ने उन्हें पिक्चर से निकाल दिया और दूसरे  एक्टर को ले लिया (किसी का नुकसान कब किसी का फायदा बन जाता है)  उनके खिलाफ केस अलग कर दिया क्युकि उनको इस सफलता से पहले ही पुराने प्राइज में साइन कर लिया था l लोग तो यह भी कह रहे हैं उनके आसपास चापलूसों की भीड़ बढ़ गई जो उन्हें गलत नसीहत दे रही हैं.. उन्हें भ्रमित कर रहे है l 


पता नहीं क्या सच है क्या नहीं बस हां इतना जानते हैं सफलता मिलना मुश्किल नहीं... मुश्किल है उस सफलता को  कायम रखना... उसको बनाए रखना... आसमान में रह कर भी खुद को जमीन से जोड़े रखना l गर तुमने यह कर लिया तो तुम असल मायने  में सफल हो l क्युकि सफलता मिलने के बाद जो सबसे मुश्किल होता है वो ये की हम आज तक जो काम  सरल और सहज़ तरीके से करते आये थे वही सफलता हमारे दिमाग में घुस हमारी सहजता और सरलता के आड़े आ जाती है और जिस हुनर की बदौलत हम सफल हुए वही अब धुंधली सी पड़ जाती है l हम खुद ही खुद को इतना ऊँचा दर्जा दे देते है की नीचे झाकने की जुर्रत ही नहीं करते और उस ऊंचाई पर हम असल में खुद से ही कोसो दूर हो जाते है l इसलिए चार दिन की सफलता की चकाचौंध में अपनी काबिलियत, अपने हुनर, अपनी सहजता को कभी धुंधला मत पड़ने देना l  इसे  बस अपनी मंजिल का एक पड़ाव समझ फिर से सफर पर निकल पड़ना l


रीशा गुप्ता 

Friday, 19 December 2025

क्या होगा

 सिर्फ औरतो के तरक्की करने से क्या होगा,

आदमी को भी कुछ तो आगे बढ़ना होगा,

औरत भले अपने चेहरे को ढके या उघाड़े,

पर तुम्हें अपनी नजरों और नीयत को साफ रखना होगा,

  औरत तो सिर्फ देह से पुरुष से कमतर है,

पर पुरुष उस पर अपना जोर चला  हर मायने में कमतर हो जाता है,

जमाना भले बहुत आगे बढ़ गया.. औरत ने चांद तारों तक के रहस्य को सुलझा लिया,

पर दिन पर दिन आदमी की गर्त में जाती सोच को कौन कभी सुलझा पायेगा, 

औरत जब तक पुरुष की मां,बहन, पत्नी, पुत्री है तब तक उसकी इज्जत है, 

रिश्तों से परे हर औरत की इज्जत को तार-तार इस पुरुष ने जाने कितनी दफा किया होगा,

यहां की सत्ता भले तुम्हारे हाथ में है इसलिए तुम बेखौफ हो,

पर वहां की सत्ता से जरा तो खौफ किया होता l

Wednesday, 17 December 2025

सबसे बड़ा रुपैया

कुछ दिन पहले एक खबर पढ़ी पति-पत्नी में तलाक हो गया और पत्नी पति से अपनी दी हुई किडनी वापस मांग रही है l असल में बात यू है की क्योंकि एक समय जब दोनों का रिश्ता बहुत गहरा था...सात जन्मों का वादा.. सात जन्मों का साथ था  तो बस उस रिश्ते और प्रेम की खातिर पत्नी ने पति को जरूरत पड़ने पर बिना सोचे समझें अपनी एक किडनी डोनेट कर दी l पर  क्योंकि अब उसी रिश्ते में खटास पैदा हो गयी l सात जन्म तो दूर की बात है सात पल रहना दोनों को गवारा नहीं था l अब जब अलग हुए तो पत्नी ने अपनी किडनी वापस करने की मांग रखी l अब भई जेवर, कपड़े लत्ते, पैसे तो फिर भी कोई दे दे पर किडनी l पढ़ कर हंसी भी आई और सोच में भी पड़ गए ऐसे तो कोई भी किसी को कुछ देने या लेने से पहले सौ दफा सोचेगा क्युकी और सब तो फिर भी दे दे पर दिया हुआ अंग वो कैसे वापस ले या दे l फिर लगा ये तो पति पत्नी का रिश्ता है जहाँ अलगाव की सम्भावना बनी रहती है पर खून के रिश्ते में ऐसी नौबत नहीं आ सकती l 


पर  हाल ही एक राजनीतिक परिवार में भी यही कोहराम मचा हुआ है l बेटी ने अपने पिता को अपनी किडनी  जरूरत पड़ने पर बिना एक पल गवाएं दे दी l पर अब परिवार में मतभेद होने पर अब उस बहन का भाई उसकी किडनी को  गन्दी किडनी कह रहा है l अब गंदा खून सुना था...किडनी भी गन्दी हो गई l पर हो भी सकता है क्युकी भाई की किडनी जरुरत से ज्यादा साफ रही होगी इसलिए  जरूरत पड़ने पर उसने अपने पिता को अपनी साफ किडनी नहीं दी l 


तो खून के रिश्तो पर से भी विश्वास उठ गया l फिर लगा एक रिश्ता होता है जो हम बाहरी दुनिया से बनाते है...व्यवहार का रिश्ता... शायद वहां ऐसा कुछ ना हो l पर जी फिर एक बार हमारे विश्वास को ठेस पहुंच ही गयी l एक एंप्लॉय जिसने जरूरत पड़ने पर अपने बॉस को अपनी किडनी दे दी l पर बॉस ठहरा बॉस... पेशेवर... अपनी कंपनी को हर हाल में ऊंचाई पर पहुँचाना... इसलिए वो रिश्ते, व्यवहार और किसी भी प्रकार के सम्बन्ध को अपने काम से अलग रखता होगा l फिर वैसे भी कहते है ना "घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या"तो बस इन सब को ध्यान में रख उस बॉस  ने उस एम्प्लोयी को यह कहते हुए नौकरी से निकाल दिया कि वह एम्पलाई रिकवर होने में समय ले रही है l सच उस वक़्त उस एम्प्लोयी को सिर्फ और सिर्फ एक गाना ही याद आ रहा होगा  "मै रोउ या हसू  करूं मैं क्या करूं..."l


सच कहावत यूं ही नहीं बनी "नेकी कर दरिया में डाल" अब जब एक बार किसी को कुछ दे दिया तो बस उसे भूल जाओ भले वह पैसे हो, वचन हो, वादा हो या फिर तुम्हारी किडनी l बेचारी लड़की पहले किडनी से  गई बाद में नौकरी l अब तो किसी रिश्ते पर विश्वास ही नहीं रहा l 


अरे पर इतनी जल्दी भी विश्वास पर से विश्वास ना उठाओ.. आखिर विश्वास पर ही तो ये दुनिया कायम है.. आज भी एक ऐसा रिश्ता है और वो है "पैसे "का.. जी हाँ पैसे लो दो और किडनी लो या दो l फिर कोई झंझट ही नहीं की पैसे देने के बाद भी कोई अपनी किडनी वापस  मांग लेगा l अब उस एम्प्लोयी को भले वो गाना याद आ रहा हो पर हमें जो एक गाना याद आ रहा है वो है..


"ना बीवी ना बच्चा ना बाप बड़ा ना भईया,

द होल थिंग इज देट की भईया सबसे बड़ा रुपैया"... 


वैसे अगर आपको कोई गाना याद आये तो कमेंट बॉक्स में बताइयेगा l

Tuesday, 16 December 2025

नीर और नारी

 नीर और नारी 


नीर (पानी) और नारी (स्त्री) या फिर नारी (स्त्री) और नीर (पानी),

कैसे भी लिख लो या फिर कैसे भी तुम पढ़ लो,

क्या फर्क पड़ता है...क्युकी कहानी या फिर कह लो किस्मत तो दोनों की लगभग एक जैसी ही  है,

जैसे पानी का भले खुद का कोई रंग ना होता,

पर जिसमें मिल जाता है.. उस  रंग में  घुल कर उस रंग का ही हो कर वो रह जाता  है,

स्त्री का भी कौन सा कोई रंग (घर )होता है,

पर जिस घर जाती है  उस रंग में घुल खुद के अस्तित्व को तक़रीबन मिटा ही देती है,

बिन पानी सब सून है... जल है तो कल है,

वैसे ही स्त्री है तो सृष्टि है,महकता चहकता हर घर आंगन है,

पानी के बिना जीवन नहीं जानते हुए भी दिन प्रतिदिन उसका दोहन हो रहा,

स्त्री अंकुर है नव जीवन का.. बावजूद उसके  कोख में ही हर रोज उसको मारा जा रहा,

दोनों के ही मोल को किसी ने नहीं समझा ,

अनमोल है दोनों पर किसने ये जाना,

शायद इसलिए  दोनों ने एक दूसरे के दर्द को समझा,

तभी तो पानी  स्त्री की आंख में समा गया,

और स्त्री ने भी पानी को खुद की आंखों में बसा लिया l

Monday, 15 December 2025

जुड़ी तारीख़े (कविता)

जब कोई इस दुनिया से हमेशा हमेशा के लिए चला जाता है तो कभी भी लौट कर वापस नहीं आता,

हम सोचते हैं कभी तो ऐसा संभव होता कि वह आता और हमारी जो इतनी अनकही बातें थे हम उससे कह पाते, कुछ दिन और उसके साथ थोड़ा तो हम जी पाते,

गिले, शिकवे,शिकायतें,खुशियां, गम, सुख दुख उसके साथ थोड़ा और बिता पाते,

पर नहीं जो एक बार चला गया,

वह कहा कभी लौट कर है आता,

तो जब जाने वाला कभी वापस नहीं आता तो उससे जुड़ी तारीखे  क्यों गाहे बगाहे  आती हैं,

रह रह कर हमारे घाव को आ फिर से हरा कर जाती है,

जैसे उसके जन्म की तारीख,उसके इस दुनिया से जाने की तारीख,

उसकी सफलताओं की तारीख,

उसकी असफलताओं के तारीख,

निराशा, आशा, उसके साथ बिताए सुनहरे दिन की हर तारीख अपने तय समय पर ही आती है,

पहली बार वह हमारी जिंदगी में आया,

आखिरी दफा हमारी जिंदगी से गया,

हर कुछ दिन में कैलेंडर के पन्ने पलटने पर उससे जुडी तमाम तारीखे आ जाती हैं,

और हमारे दुख को जैसे और गहन कर जाती है,

उन तारीखों से जुड़ी उसकी हर याद टीस बनकर हमारी जिंदगी में फिर से उभर आती हैं,

अगर वह वापस नहीं आ सकता तो अपने साथ उन तारीख को क्यों नहीं ले जाता,

या कही इन तारीखो के  बहाने वो हमारे पास है यह एहसास दिलाता है रहता,

उससे जुड़ी वो हर तारीख एक टीस देती हैं या फिर सुकून,

सच कहूं यह एहसास व्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल है,

पता नहीं उससे जुडी हर तारीख  को हमेशा के लिए उसके साथ चले जाना चाहिए,

या फिर जैसे तारीखे आती है... कभी तो लौट कर उसे भी आना चाहिए l

अपना अपना आसमान

घर की सार संभाल करते  ध्यान घर की टेरिस पर गया l लगा फर्श पर कुछ गिरा पड़ा है l  देखा कोई पतंग कट कर गिरी  है l इस वक्त  पतंग...अभी तो पतंग का समय कहां है l फिर ध्यान आया बच्चों के लिए कब कोई तय दिन और समय होता है दिवाली के बाद से ही उनका पतंग का मौसम चालू l  हाँ मुझे अजीब लगा क्युकी अब मेरे बच्चों का बचपन जो बीत गया... वैसे भी आजकल बचपन समय से पहले बीत जाता है l वरना कुछ साल पहले मेरे बच्चे की भी ऐसी ही पतंगे आसमान में टकी रहती थी और अगर ऐसी कोई पतंग कट कर आये तो भले हाथ में उड़ने वाली पतंग छोड़ दे... घर में अनगिनत पतंग पड़ी हो पर उस कटी पतंग सा स्वाद कही नही मिलता l और उस स्वाद को सिर्फ वही नहीं चखता उसके साथ मैं भी चखती l टेरेस पर पड़ी उस पतंग को देख एक पल को मन खुश हुआ ही था पर अचानक वह पतंग बेमानी और बेकार लगने लगी l लगा किसको दूंगी यह पतंग क्योंकि एक बेटे ने तो अपने करियर को उड़ान देने के लिए अपना एक अलग आसमान बना लिया जहां  इन पतंगो की कोई जगह नहीं या फिर मज़बूरी है की अगर पतंगो को जगह दे दी तो उसका बनाया आसमान कही छोटा ना पड़ जाये l और जो बच्चे यहाँ है उन्होंने खुद को एग्जाम के प्रेशर और मोबाइल, गेजेट्स  की दुनिया में  डूबो कर अपने आसमान को इस हद तक छोटा कर लिया की पतंगों की वहां नाम मात्र की भी जगह नहीं l 


सच जो चीज किसी समय हमे  ख़ुशी देती है पर किसी दूसरे पल बेमानी और बेकार होती है तो ख़ुशी या दुख चीजों से नहीं मन की अवस्था और वक्त पर निर्भर करती है l 


खैर उस कटी पतंग को उसका सही आसमान मिल जाये इस आशा में मैंने घर में काम करने वाली सहायिका से कहा,


" तुम ले जाओ यह पतंग तुम्हारे बच्चे उड़ा लेंगे ",


वो हंसते हुए बोली,


"पतंग कौन उडाता हैं अब...इस मोबाइल से फुर्सत मिले तब ना",


ये कहते उस माँ की खोखली हसीं का  दर्द  मैं बिना मुश्किल के महसूस कर रही थी l करती भी कैसे ना ये दर्द एक नहीं वहां मौजूद दो माँ का जो  था l 


सच जहां किसी बच्चे ने अपनी उड़ान के लिए एक अलग आसमान  चुन लिया तो कुछ ने मोबाइल में अपने आकाश को  संकुचित कर लिया l फिर मां का आकाश तो होते ही उसके बच्चे है उनके होने से उसका आसमान रंग बिरंगा वरना वीरान और सूना l 


अचानक आसमान पर नजर गई कुछ एक पतंगे अभी भी आसमान में उड़ रही थी l शायद यह पतंगे उस बचपन की होगी जहाँ करियर का दबाव अभी पंहुचा नहीं या  मोबाइल ने उनके आसमान को संकुचित नहीं किया l भारी मन से उस पतंग को उठा अंदर आ गयी और सोचने लगी,


भले वक्त पर सब  अपने अलग-अलग आकाश बना ले पर उस विधाता ने जो एक आकाश दिया उसको कभी सूना ना पड़ने दे l पर इसके लिए तो सबको कुछ पल तो ऐसे बनाने होंगे जब अपने अपने बनाये आकाश को छोड़ कर सिर्फ उस एक आकाश की और देखना होगा l

Sunday, 14 December 2025

बचपन

“बेटा थोड़ी मैग्गी मुझे भी मिलेगी क्या? रोज  खाने में खिचड़ी खाकर ऊब गया.. थोड़ा मुँह स्वाद हो जाएगा l  बहू से बोल दो चम्मच मैगी मुझे भी दे दे ",


रसोई में आती मैगी की महक महसूस कर किसी छोटे बच्चे की तरह जगदीश जी अपने बेटे संजय से अनुरोध करने लगे l उनके अनुरोध में बिल्कुल बच्चों जैसी आकुलता छलक लग रही थी जिसे देख संजय भावुक हो गया l 


संजय ने रसोई में आकर कुछ कहने की बजाय एक नजर चार्वी को देखा... क्युकी उसे मालूम था अब तक चार्वी ने बाहर पापा और बेटे की बातें तो सुन ही ली थी और उसका अंदाजा बिलकुल सही निकला l पैन में चढ़ी मैगी में मसाला डालते हुए चार्वी बड़बड़ करती बोली,


" अरे तुम्हारे पापा क्या बच्चे हैं जो इस उम्र में भी मैगी खाएंगे l  कुछ तो अपनी उम्र का लिहाज करें कभी बच्चों के पिज्जा पर नजर  तो कभी बच्चों की आइसक्रीम पर",


संजय को डर था कही चार्वी की बात पापा के कान में ना पड़ जाये l  चार्वी से धीरे बोलने का इशारा कर वह बात संभालते हुए बोला,


"अरे  नाराज क्यों होती हो तुम तो जानती हो बुढ़ापा इंसान का दूसरा बचपन ही तो होता है.. दे दो जरा सी मैग्गी",


चार्वी  ने अपने आठ साल के बेटे को मैगी की प्लेट पकड़ाई और संजय को एक कटोरी में दो चम्मच मैगी देते हुए बोली,


" बस इतनी ही है सार्थक के लिए बनायीं थी उसके हिस्से की निकाल कर दी है l खुद का खाना तो भाता नहीं मेरे बच्चे के खाने पर नजर रहती है",


इधर सार्थक सब सुन रहा था l आए दिन वह घर में ऐसी बातें सुनता था जो उसके अवचेतन मन में बैठती जा रही थी जिससे उसका मासूम बचपन धीरे धीरे परिपक्व होता जा रहा था l जिसे संजय ने भी महसूस किया पर कुछ कर नहीं सकता l जैसे ही चार्वी अपने कमरे में गई उसने अपनी मम्मी की नजर बचाकर अपनी प्लेट में से थोड़ी मैग्गी दादाजी की प्लेट में दे दी l उस मैग्गी को देख दादाजी की नजरों में  और चमक आ गई l  वह मैगी के लंबे लच्छे  बनाते हुए उसे छोटे बच्चे की तरह सुडकने लगे  जिसे देख सार्थक को भी हसीं आ गयी l


इधर संजय रसोई से सब देख रहा था अपने बेटे  के बचपन की परिपक्वता और पापा के बुढ़ापे का बचपन देख कर उसकी आँखे छलछला आयी l


रीशा गुप्ता ✍🏻✍🏻

Saturday, 13 December 2025

ठीक हूँ

ठीक हूँ (कविता)


जब तुम ठीक नहीं होते तो तुम्हारे आसपास के लोग तुमसे पूछते हैं,

"तुम ठीक हो,"

तुम कहते हो "नहीं,"

सामने से जवाब आता है "ध्यान रखो सब ठीक हो जाएगा,"

फिर दो बार...तीन बार या एक आध बार और पूछ लेते हैं "ठीक हो"

और तुम  कह देते हो "हां ठीक हूँ"

वास्तव में अब तुम वह कह रहे हो जो वह सुनना चाहते हैं,

जबकि वह भी जानते हैं कि तुम ठीक नहीं हो,

पर वह बस तुमसे ठीक है सुन खुद आश्वस्त  होना चाहते हैं,

ताकि तुम्हारा ख्याल रखने..तुम्हारा हाल पूछने की औपचारिकता से अब वो बरी  हो सके,

तुम्हारे ठीक नहीं होने पर भी तुम्हारा हाल ना पूछने के अपराध बोध से खुद को मुक्त कर सके,

और तुम  ठीक नहीं हो कर भी  उनको ठीक लगे,

इसलिए कहने भर को ठीक हो जाते हो l


रीशा गुप्ता ✍🏻✍🏻

Friday, 12 December 2025

कंपल्सरी विषय

सुबह पूरी तरह आँख भी नहीं खुली की उसकी उनिंदीं  नजऱ अपने बगल में गयी... जाहिर हैँ इस वक्त तक उसकी अनुपस्थिति  उसे अपेक्षित थी.. तभी बगल में रखे तकिये पर सहसा हाथ चला गया काश यह हाथ तकिये की जगह रात को उसके आँसूओ पर चला जाता l पर उस वक़्त वो वहाँ मौजूद थी और अब ज़ब वो नहीं हैँ यही वजह हैँ उसका हाथ तकिये पर  गया l शायद इसलिए कहते हैँ किसी की मौजूदगी में उसे अपना कंधा दो मरने के बाद तो सब देते हैँ l रात को जिन आँसूओ की उसने उपेक्षा की थी  उस उपेक्षा के निशान गीलेपन के रूप में उसे उसके तकिये पर साफ महसूस हो रहे थे l   सहसा उसके प्रति कोमल अहसास उसके मन में जागे और खुद पर धिक्कार  हुआ की जो नमी उसे अपने सीने पर महसूस करनी चाहिए थी वो इस तकिये पर कर रहा हैँ l अपने अहम् और अकड़ में रात को उससे पानी के लिए भी नहीं पूछा... बेड के बगल में रखी पानी की भरी बोतल देख उसे खुद पर गुस्सा आया l आलस के कारण वो खुद कहा कभी पानी  पीती हैँ जब तक वो जबरदस्ती ना करें l दिल खुद को अपने व्यवहार के लिए धिक्कारने ही वाला था पर तभी अहम् ने फिर से उसके भावो को गर्त में डाल दिया l नींद से पूरी तरह जग चुका था तो दिमाग़  में नये नये खयाल भी जगने लगे l आज घर में कुछ नॉर्मल तो नहीं होगा...रात को उन दोनों के बीच जो इतना एबनॉर्मल हुआ... छोटी सी बात  शुरू हो  कहां से कहां तक पहुंच गई... दोनों के बीच कुछ नार्मल  बचा ही नहीं l फिर इतना एब्नार्मल होने पर कहां अब कुछ नॉर्मल होने की गुंजाइश बची है l 


पर तभी बाहर जो खामोशी,सन्नाटे की उसने अपेक्षा की थी वो सन्नाटा ना तो उसे सुनाई दिया ना कहीं भी महसूस ही हुआ l बाहर की सब आवाजे वो सुन पा रहा था... जो उसकी अपेक्षा के विपरीत ही थी l बच्चे आज भी रोज की तरह  मम्मी से  अपनी बेशुमार फरमाशो को पूरा  कराने में लगे थे और उनकी मम्मी भी उन्हें वही प्यार भरे उलाहने देती उसी ममता और खुशी से उनकी फरमाइशो को पूरा करने  में जुटी थी... रात को उन दोनों के बीच का जो गुस्सा था... तनाव था उसका हल्का सा अंश भी उसकी ममता में उसे घुला हुआ जरा भी महसूस नहीं हुआ l उसकी हैरानी ख़तम भी नहीं हुई की  मम्मी की वही चिरपरिचित आवाज,


"बहू बच्चों को स्कूल भेजने के बाद मेरे लिए  थोड़ा गुनगुना पानी कर देना"


"जी मम्मी" की वही संक्षिप्त आवाज जिसमें कोई ठंडापन, कोई खामोशी, कोई उदासी,नाराजगी कुछ भी तो नहीं दिख रही थी... तभी पापा ने फल की थैली पकड़ाते हुए कहा,


" ले बेटा इसे धो कर फ्रिज  में रख देना",


" जी पापा "


की वही हमेशा की तरह सधी और लिहाज भरी आवाज l क्या वाकई वो नार्मल हो गयी..अगर बाहर सब नॉर्मल है तो  रात को जो इतना एब्नार्मल हुआ मतलब वो सब  भूल गई l पर कैसे...जो कुछ हुआ  इतनी जल्दी भूलने की बात तो नहीं हैँ l 


इस सामान्य को   वो स्वीकार नहीं कर पा रहा था इसलिए अपनी स्वीकृति पर मोहर लगाने के  लिए वो सोच कर बैठा था कि शायद आज चाय  किसी और के हाथो भिजवाएगी या फिर आए ही ना l और अगर वो खुद चाय के साथ आ भी गयी  तो रात की शिकायतो, तानो, नाराजगी की बरसात जो थोड़ी देर  नींद ने थाम ली  थी (हाँ ये नींद  एकतरफ़ा ही थी  उसने तो निश्चिंत ही आँसूओ के साथ रात काटी होगी) दोनों के आमने सामने होते ही फिर बरसने लगेगी l 


वो मन ही मन कल्पनाओ के घोड़े दौड़ा रहा... अगर उसने कुछ कहा तो वो भी चुप नहीं रहेगा l तभी उसके मन के घोड़े को लगाम लगाती वो बिखरे बालों को बेतरतीबी से बांधे हुए चाय और साथ में वही उसकी सेहत को ध्यान में रखते हुए दो बिस्किट लेकर आई l चाय, बिस्किट्स साथ में वो खुद...क्या वाकई सब नार्मल हो गया... पर इतनी जल्दी... कैसे? 


ना चेहरे पर शिकन, ना उदासी.. हां मुस्कान थोड़ी कम जरूर लग रही थी या जबरदस्ती ओढ़ रखी थी  या फिर ये भी उसका वहम था उसके उसी एबनार्मल अपेक्षित व्यवहार की तरह l हां रात के बहे अनगिनत आंसू अब भी आंखों के नीचे सूजन के रूप में वो चोर नजरों से देख पा रहा था.. जिन्हे वो भी नजरें चुरा कुशलता से छिपाने का हरसंभव प्रयास कर रही थी l वो नजरें इसलिए भी नहीं मिला रही थी क्युकी वो जानता था नजरें मिलते ही उसके आंसू उसका कहा नहीं मानने वाले और वो उन्हें रात की तरह इतनी जल्दी फिर से उपेक्षित नहीं कर सकती... फिर अभी इनके लिए उसके पास समय भी कहा l 


उसने झिझकते हुए उसके हाथ से चाय का कप पकड़ा...दोनों पूरी कोशिश में थे नजरें ना मिले l पर "मन जिसे नजरअंदाज करता हैँ ये नजरें रह रह कर आ वही ठहरती हैँ"... वही उन दोनों के बीच हुआ... जैसे ही दोनों की नजरे टकराई उसकी आँखों में पसरी हैरानी उसने महसूस कर ली (वैसे भी उसके मन में भाव बाद में आये पढ़ वो पहले लेती हैँ... इस मामले में हमेशा उससे आगे ही रही... और आगे पीछे की तो बात क्या... वो तो इसमें उसका साथ किसी भी जगह अपेक्षित ही नहीं करती)  उसकी हैरानी का जवाब उसने आँखों से ही दिया... वैसे भी संवाद की अभी कुछ देर तो कोई गुंजाईश बची  नहीं  .. कम से कम जब तक बहुत जरुरत ना हो l उसकी आँखो ने बोलना शुरू किया,


" हैरान मत हो  हम दोनों के बीच में जो कुछ भी एबनॉर्मल था या हुआ अगर वह खुद के साथ इस कमरे से बाहर ले जाती तो हर जगह हमारे रिश्ते के एब्नार्मल  निशान छप जायेंगे... तुम्हारे घर में...बच्चों में.. मम्मी पापा में l और वह कभी नहीं चाहती अपने बच्चों को हमारे तनाव के कारण सहमा देखे... उनसे उनकी सहज़ मासूम मुस्कान छीने... मम्मी पापा या घर में किसी को भी हमारे रिश्ते में पसरी कमजोरी की आहट नहीं सुना सकती l इसलिए एबनॉर्मल से नॉर्मल होना उसकी कोई चॉइस नहीं है... उसने चुना नहीं बल्कि यह तो उसे करना पड़ा l इसके अलावा उसके पास कोई ऑप्शन भी तो नहीं था l ये कोई कॉलेज का ऑप्शनल विषय नहीं जिसे पढ़ने की उसको कोई चॉइस मिले... ये तो जिंदगी का कंपल्सरी विषय हैँ जिसे  ना चाहते भी उसे पढ़ना है l वरना अगर कॉलेज की तरह उसे चॉइस मिलती  तो वह बिखरे बाल,सूजी आँखे,उदासी, मातम, शिकायतों के तमाम पुलिंदे...रात की वो सारी एब्नार्मेलिटी को  अब भी एक कोने में ज्यो का त्यों  ले कर बैठी रहती l पर कहा ना ये कॉलेज नहीं जिंदगी हैँ जहाँ उसके पास चॉइस नहीं  l तभी बाहर से आवाज आयी,


"मम्मी टिफ़िन दो हमारी बस आ गयी ",


और वो "आयी "की आवाज लगाती बाहर निकल गयी उसको वैसे ही हैरानी में छोड़ कर... हाथ में पकड़ी चाय पर पपड़ी जम चुकी थी पर रात की अबनॉर्मेलिटी से सुबह की नॉर्मेलिटी उसे अब भी हजम नहीं हो रही थी l


रीशा गुप्ता ✍🏻✍🏻

Thursday, 11 December 2025

भोले अभिभावक

एक बहुत ही प्यारा, भावुक और इनोसेंट वीडियो वायरल हो रहा है इसमें एक लड़की अपने पापा को गुड बाय कहते समय अपने हाथ से कोरियन दिल का साइन बनाती है जब उसके पापा उसे रेलवे स्टेशन पर छोड़ने आते हैं l कुछ कुछ यह साइन ऐसा होता है जैसे हम पैसों के लिए कह रहे हैं l अब उन पापा को लगा बेटी उनसे कुछ पैसे मांग रही है... इधर ट्रेन चलने ही वाली थी उसके पापा ने अपनी जेब से फटाफट से जितने भी खुल्ले पैसे थे वो निकाले और उसे देने लगे... ऐसा करते समय एक तनाव, हड़बड़ी, घबराहट उनके चेहरे पर थी कहीं ट्रेन पैसे देने से पहले चल ना दे l बेटी को कैसे भी करके उसकी  जरूरत के पैसे दे दे l और फिर जब पैसे दे दिए और ट्रैन ने स्टेशन छोड़ दिया तो नम आंखों से उसे देर तक हाथ हिलाते रहे l पर साथ में चेहरे पर संतोष और सुकून था की बेटी को उसके मांगने पर पैसे दे सके और बेटी का उन पर यू अधिकार जताना भी उस भोले पिता को भाव विभोर कर गया l अपने बच्चे की जरुरत के वक्त उसकी जरुरत पूरी कर सके एक पिता को इससे बड़ा सुकून और क्या ही मिलेगा l


लोग उस प्यारे से वीडियो पर कमेंट कर रहे हैं...' पापा कितने भोले होते हैं उन्हें नहीं पता बेटी उनसे पैसे नहीं मांग रही थी बल्कि गुड बाय करके समय उन्हें कोरियन दिल बना रही है"l खैर जी इस वीडियो से पहले हम खुद नहीं जानते थे की कोरियन दिल ऐसे बनता है l उन पापा की जगह शायद मैं होती तो शायद मै भी यही करती l हर कोई कमेंट में कह रहा है पापा लोग कितने भोले, कितने मासूम होते है... बच्चों की जरूरतों के सिवाय उन्हें कुछ दिखता ही नहीं "l (इन कमैंट्स में अधिकतर संख्या जेन जी ही थी जिनकी दुनिया के लिए कोरियन दिल का साइन कोई अजूबा नहीं... कोई नई बात नहीं ) l


वही एक वीडियो में एक बेटी रात को दो बजे अपने पापा को कॉल करके रो रही है  जो कि डॉक्टर की पढ़ाई कर रही थी पर उससे ये पढ़ाई हो नहीं पा रही थी l वो बहुत हताश, निराश हो चुकी थी... बुरी तरह से टूट चुकी थी और खुद को फेल और नाकाम समझ रही थी... खुद पर विश्वास खो चुकी थी... हिम्मत हार उसने घुटने टेक दिए  l पर उसके पापा उसे समझा रहे हैं... उसे मोटिवेट कर रहे हैं...उसे हिम्मत दिला रहे हैं कि सिर्फ डॉक्टर नहीं बनने से   तो तेरा करियर खत्म  नहीं हो जाएगा और भी कितने फील्ड है l फिर तू चिंता क्यों करती है तेरे पापा है ना तेरे साथ वह सब संभाल लेंगे... अभी  मैं बूढ़ा नहीं हुआ मैं खूब कमा लूंगा तू बिल्कुल चिंता मत कर l वह फोन पर ही बेटी को समझाने का अपनी तरफ से भरसर प्रयास कर रहे हैं ताकि उनकी बेटी इस मुसीबत में घबराएं नहीं... दूर रह कर कही  अकेली नहीं पड़ जाये और कोई गलत कदम ना उठा ले l किसी कुशल मोटीवेटर की तरह वो अपनी बेटी को समझा रहे है या शायद उससे भी एक कदम बढ़ कर l 


जहाँ पहले वीडियो में भोले पापा वही दूसरे में मोटीवेटर और समझदार पापा l सच अभिभावक कितने भी भोले हो और बच्चे कितने भी समझदार पर कभी-कभी जिंदगी में ऐसा मुकाम आता है जब वो भोले भाले अभिभावक अपने समझदार बच्चों को जरुरत पड़ने पर हर मुसीबत से बाहर निकाल ही लाते हैं... जब तक वो है अपने बच्चों को कभी गिरने नहीं देते l 


इसलिए भले तुम्हारे अभिभावक कितने भी भोले हो.. आज की तुम्हारी इस एडवांस दुनिया से कितना भी पीछे हो पर मुसीबत हो तो इन समझदार, चालाक और एडवांस दुनिया से मदद लेने की बजाय अपने भोले अभिभावक से ही मदद लेना l देखना ये भोले अभिभावक जो तुम्हारी समझदार  दुनिया से भले नासमझ और अनजान हो पर वक्त पड़ने पर तुम्हारी मुसीबत में  कितने समझदार बन जाते है और तुम्हे हर मुसीबत से बाहर निकाल ही लाते है l अब ये भोले से समझदार कैसे बनते है ये बच्चों की समझ से तब तक बाहर ही रहेगा जब तक वो उनकी जगह पर  नहीं आ जाते l


रीशा गुप्ता ✍️✍️

तालमेल

 शहर में प्रदूषण की हालत तेजी से बिगड़ती जा रही थी l खांसी, दमे, फेफड़ों की समस्या से सिर्फ बच्चे और बुजुर्ग ही नहीं हर उम्र के लोग परेशान थे l लोग सरकार से मांग कर रहे स्कूल, ऑफिस बंद कर दिए जाएं... ऑनलाइन शिक्षा और वर्क फ्रॉम होम किया जाए l  कोर्ट ने भी  शहर में सभी तरह के निर्माण कार्यों को तुरंत बंद करने के आदेश पारित कर दिए l  बढ़ता प्रदूषण, लोगो का आक्रोश, कोर्ट के आदेश के  सामने सरकार  तुरंत हरकत में आयी और सारे आदेशों को तुरंत प्रभाव से लागू किया गया l 


शहर के एक बड़े प्राइवेट स्कूल की ईमारत में बैठे  बच्चों को जैसे ही ये खबर मिली तो सबके चेहरे ख़ुशी से खिल गए  l  प्रदूषण से राहत मिलने की ख़ुशी से ज्यादा खुश इस बात से थे कि कल से स्कूल की छुट्टी और उनके पापा की भी छुट्टी l (सच बच्चों की दुनिया ऐसी ही होती है बड़ी खुशियों का इंतजार करने की बजाय वो छोटी छोटी खुशियों में ही अपनी ख़ुशी ढूंढ़ लेते  है )इधर उस प्राइवेट स्कूल के पास में ही एक सरकारी स्कूल भी था जहां गरीब तबके के बच्चे पढ़ने आते थे l जैसे ही अध्यापक ने उन बच्चों को ये खबर दी सब बच्चों के चेहरे खुश होने के बजाय लटक गए l आशा के विपरीत उनके लटके चेहरे देख अध्यापक अचरज से बोले,

" क्यों बच्चों उदास क्यों हो अरे बच्चों को तो छुट्टी का बहाना चाहिए होता है... छुट्टी के नाम से ही उछल पड़ते  हैं",

बच्चों ने अपनी उदासी का कारण अपने अध्यापक को बताया,

" टीचर जी पापा भी अब घर बैठेंगे तो फिर घर में चुल्हा कैसे जलेगा l सरकार तो प्रदूषण के नाम पर हर साल छुट्टी कर देती है... सबसे पहले पापा के काम पर ही रोक लगा देती है l पर हमारा पेट... हमारी भूख उस पर तो किसी प्रदूषण का कोई असर नहीं होता... वहां कभी कोई छुट्टी नहीं होती ",

कक्षा में सन्नाटा छा गया l अमूमन बच्चों के हर सवाल का जवाब देने वाले अध्यापक भी आज बच्चों के इस सवाल का जवाब देने में असमर्थ थे l बेबस अध्यापक की नजर खिड़की से बाहर गई l पास में ही चौखटी थी जहां हमेशा काम ढूंढ़ते मजदूरों की भीड़ लगी रहती थी l आज वह भी सूनी सी दिखाई दे रही थी.. प्रदूषण ने इसे भी अपने लपेटे में ले ही लिया l अध्यापक कभी सूनी चौखटी देखता तो कभी बच्चों के चिंतित चेहरे और दोनों में तालमेल बिठा रहा...बैठाये भी क्यों ना इस चौखटी का सूनापन ही तो बच्चों के चेहरे के तनाव का कारण था l

रीशा गुप्ता ✍🏻