Jindagi ek unsuljhi paheli

https://www.blogger.com/blogger.g?blogID=109319055420907736#pageelements

Saturday, 28 August 2021

आ बैल मुझे मार (कांसेंट फॉर्म )

 

तीसरी लहर सितंबर से अक्टूबर  के बीच आएगी I (ऐसा अनुमान हैँ )

इसमें बच्चों को खतरा ज्यादा है I (निसंदेह होगा भी, क्यूंकि 18 साल से ऊपर वालों  के टीका लग चुका है )

इसी बीच सरकार ने स्कूल खोलने की परमिशन दे दी I

9 से 12 कक्षा तक के स्कूल खुलेंगे, (इस कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों की उम्र सामान्यतः 14 से 18 के बीच होती है, मतलब की इन बच्चों के अभी तक टीका नहीं लगा)

सरकार ने कहा है कि स्कूल बाध्य नहीं करेंगे, कक्षाएं ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों मोड में  चलेंगी I

स्कूल से कांसेंट  फॉर्म भेजे जा रहे हैं,जिनको भरना अभिभावकों के लिए अनिवार्य है, इसमें साफ-साफ लिखा है कि  बच्चों को कुछ भी होता है तो सारी जिम्मेदारी अभिभावकों के ऊपर I स्कूल वाले अपने ऊपर कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं, (मतलब की कोई तो डर हैँ तभी तो वो जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं ),उनको तो बस स्कूल खोलने हैं I

साथ ही बच्चों और अभिभावकों पर अनावश्यक दबाव डाल रहे हैं, कभी एग्जाम्स के रूप में,कभी दूसरे रूप में, जिससे स्कूल भेजना जरूरी है I

अभिभावक बेचारे ठगे से खड़े हैँ क्या करें, अपने नौनिहालों को जानबूझकर कैसे खतरे में डाल दें I यह तो वही हालत हो गई जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट में लिखा होता है, 'यात्री अपने सामान की हिफाजत खुद करें', पर यहां बात सामान कि नहीं अभिभावकों की जान की है, जो माता-पिता अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाते हैं, फ़िर कैसे अपने जिगर के टुकड़े को खतरे में भेज दे I

आए दिन खबर आ रही है जहां भी स्कूल खुले,कितने ही बच्चे पॉजिटिव हो गए I कई स्कूल सील करनें पड़े I मुंबई में भी एक स्कूल में 22 बच्चे पॉजिटिव,जिसमें 4 बच्चें 12 साल से कम उम्र के  I

जैसे सिगरेट के पैकेट पर लिखा होता है 'सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है',

और इसमें तो फ़िर भी जिसको लत होती हैँ वही पीता हैँ, यहाँ तो सबको पीनी ही पड़ेगी I

स्कूल वाले स्कूल खोलने को अगर इतने ही बेचैन है,एक बार तो कोई स्कूल हिम्मत दिखाता,ऐसा कांसेंट फॉर्म भेजता जिसमे लिखा होता,

'आप अपने बच्चों को भेजो,उनको सुरक्षा देना हमारा जिम्मा,वह आपकी ही नहीं हमारी भी जान है ',

एक बार तो कोई स्कूल ऐसा  कदम उठाता, तब शायद अभिभावकों को थोड़ी हिम्मत भी आती I

माना ऑनलाइन पढ़ाई में बच्चों को जो शिक्षा मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पा रही, उनका सर्वागीण विकास नहीं हो पा रहा I हर अभिभावक चाहता है कि सब कुछ पहले जैसा सामान्य हो जाए, पर अपने बच्चों की जान की कीमत पर तो किसी भी हालत में नहीं I


Wednesday, 25 August 2021

हिंदी भाषा

हॉल में उपस्थित सारे लोग गिटपिट अंग्रेजी में बोल कर अपनी बौद्धिकता का प्रदर्शन कर रहे थे I अंग्रेजी तो उनके मुंह से ऐसे निकल रही थी,मानो यही उनकी मातृभाषा हो I अंग्रेजी बोलना मात्र ही जैसे उनकी बौद्धिकता का प्रमाण पत्र  हो I

हिंदी बोलने वालों की यहां पर कोई जगह नहीं थी I एक पल को वो ठिठका, सहमा,क्या यहां अपनी बात रखना सही होगा,यह समझ भी पाएंगे उसकी बात I पर उसको अपने ऊपर पूर्ण विश्वास था, यकीन था  खुद के ऊपर I

और जैसे ही उसने बोलना शुरू किया, एक पल को तो लोग उसको हिकारत से देखने लगे I मानो यह कोई अलग ग्रह से आया कोई अनपढ़ गँवार हो I वहां उपस्थित लोग ऐसा अभिनय कर रहे जैसे उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा I पर वह ना ठिठका और ना झिझका I  एक-एक शब्द को बहुत ही सधे अंदाज में बोल रहा, और अपनी बात को लोगों के सामने पूरे तर्क और वितर्क के साथ रख रहा I

धीरे-धीरे जो लोग अभी तक अंग्रेजी बोलने वालों को ही बौद्धिक समझ रहे, उसकी बौद्धिकता का लोहा मानने लगे, और उसकी वाहवाही करने लगे I धीरे-धीरे जो लोग उससे कतरा रहे, उसके चारों और उसको सुनने वालों की भीड़ जमा हो गई I और वह अभी भी अपनी बात पूर्ण आत्मविश्वास के साथ हिंदी में रख रहा था I

उसने अपनी बात के साथ लोगो को ये भी समझा दिया की भाषा किसी की बौद्धिकता का प्रमाण पत्र नहीं होती I


Wednesday, 18 August 2021

शिक्षक का योगदान

 

और बेस्ट स्पीच का अवार्ड जाता है प्रतीक को '

पूरा स्कूल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा I डॉक्टर प्रतीक ने वीडियो वही रोक दिया,न जाने कितनी बार अपनी स्पीच के इस वीडियो को देखते I हर बार उनकी आंखें नम हो जाती I और हर बार अपने संजीव सर के प्रति नतमस्तक हो जाते I ये उन्ही की मेहनत और विश्वास का नतीजा था,जो वो इतने प्रभावी तरीके से स्पीच दे पा रहे थे I

अनायासा वह अपनी पुरानी स्कूल की यादों में खो गए I प्रतीक एक डरपोक,आत्मविश्वास की कमी से जूझता बच्चा, किसी के भी सामने वो पसीने से लथपथ हो जाता, और  इसी डर के कारण उसको बोलने में घबराहट होने लगी,और वो हकलाने लगा I

कक्षा में बच्चे उसका मजाक बनाते  I उसको हकला हकला कह चिढ़ाने लगे I धीरे-धीरे वह बिल्कुल चुप रहने लगा I सबसे कटा कटा रहने लगा I कोई भी उसका दोस्त नहीं था I

स्कूल में सांस्कृतिक गतिविधि के एक नये शिक्षक आये थे संजीव सर I उन्होंने एक भाषण प्रतियोगिता के लिए बच्चों के नाम मांगे I सब बच्चें  बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे, पर प्रतीक चुपचाप पीछे की बेंच पर मानो सबसे छिप कर बैठा था I


जब संजीव सर की उस पर नजर पड़ी और पूछा,

'तुम क्यों नहीं ले रहे हिस्सा ',

सब बच्चें हॅसने लगे,

'सर ये तो हकला हैँ, इसको तो सही से बोलना ही नहीं आता, ये क्या भाषण देगा 'I

सर ने सब बच्चों को डांट कर चुप कराया और प्रतीक को अपने पास बुलाया I कितना डरा हुआ था वह उस दिन भी I पर सर ने अपने प्यार और अपनत्व से उसका डर दूर करा I उसको विश्वास दिलाया कि वह कुछ भी कर सकता है, उसके अंदर छिपे आत्मविश्वास को बढ़ाया I  और आखिरकार उनकी मेहनत रंग लायी I आगे जाकर वो चुप रहने वाला प्रतीक एक सफल वक्ता बन गया I स्टेज पर चढ़ते ही शब्द अपने आप उसके मुंह से निकलते I

बस उसने ठान लिया वह एक बहुत बड़ा स्पीच थैरेपिस्ट बनेगा I क्यूंकि वो ऐसे लोगो की समस्या की जड़ को अच्छे से जानता था  I  आज वह अपने सर की बदौलत ही शहर का नंबर वन स्पीच थैरेपिस्ट हैँ I और ना जाने कितने ही बच्चों की समस्या को अपने प्यार और विश्वास से दूर करता हैँ I

सच अगर आज संजीव सर उसकी जिन्दगी में नहीं आते तो वह तो कब का अपने आप को इस दुनिया के डर से समेट चुका होता I


Thursday, 12 August 2021

यादगार राखी

 राखी भाई-बहन के पवित्र बंधन का एक अनोखा सा त्यौहार I सब जानते हैँ इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है, और भाई उसकी सुरक्षा का वचन लेता है I भाई बचपन से ही फ़िर चाहे वह छोटा हो या बड़ा,बहन की हिफाजत में,उसकी सुरक्षा में हमेशा आगे रहता है और इसके लिए उसको कोई वचन नहीं दिलाना पड़ता, वो तो स्वतः ही अपने मन से ये काम करता है, मानो ये उस का फर्ज है,उसका कर्तव्य है I तो फिर क्यों यह राखी का पर्व मनाना I क्या भाई को याद दिलाना पड़ता है...नहीं, इस पर्व को मना भाई और बहन की एक दूसरे के प्रति जो मन में छिपी भावनाये हैँ,जो एहसास है, इस दिन उसका उन दोनों को मानो आभास होता है I आप भी किसी की बहन होंगी,किसी के भाई होंगे, एक बार अपने दिल पर हाथ रख कर बताना,क्या नहीं होता इस दिन एक सुखद अनुभूति, एक अलग एहसास I

होने को तो हर राखी ही यादगार होती है,पर मुझे मेरी बचपन की दो राखी बहुत ही यादगार हैँ I बचपन में हर भाई बहन की तरह मेरी और मेरे भाई की बहुत लड़ाई होती थी I राखी से एक-दो दिन पहले हम दोनों की लड़ाई हो गई, और हमारी बोलचाल बंद हो गई  I मम्मी मामा के यहां राखी मनाने चली गई I राखी पर सुबह से हम दोनों अपने हठ में बैठे, पहल कौन करे I दोनों ही राखी मनाने के लिए बेकरार, पर बाल हठ और अहम रिश्तो के आड़े आ रहा, पहल कौन करे I बस यही दोनों के मन में चल रहा I दोपहर में पापा ने हम दोनों से कहा,

' राखी नहीं मनानी क्या ',

बस क्या था, हम तो जैसे इसी मौके की तलाश में बैठे थे I भाई ने झट से अपनी कलाई आगे कर दी और मैंने भी फटाफट उसके राखी बांध दी I उस समय हम दोनों के मन में जो भावनाओं का तूफान हिलोरे मार रहा था,उसको शायद ही कभी शब्दों में बांध पाऊं  I

हमारा संयुक्त परिवार था, मेरी ताई जी के यहां एक आठ दस साल का छोटू नाम का लड़का बतौर सहायक काम करता था I उसकी मुझसे बहुत पटती थी I बहुत पटर पटर करता था I

  राखी पर मैं मेरे इतने सारे भाइयों के राखी बांध रही, पर आज पटर पटर करने वाला वो छोटू चुपचाप सब देख रहा I मुझसे उसके चेहरे की उदासी और अकेलापन छुपा नहीं I, मैंने उसकी कलाई पर राखी बांध दी,एक पल को तो वह अचकचा गया,तभी उसको एहसास हुआ कि मुझे क्या तोहफा दे I मैंने उसको आंखों ही आंखों में आश्वस्त किया कि मुझे कुछ नहीं चाहिए  I उसकी आंखें नम हो गई I वह बोला,

' दीदी मैं आपको कभी नहीं भूलूंगा 'I

आज इस बात को वर्षो हो गए, पता नहीं  वह कहां है कैसा है,और शायद मुझे भूल भी गया हो,पर मैं उसको कभी नहीं भूलूंगी I

राखी पर यही दुआ हर भाई  और बहन का प्यार सलामत रहे I

Tuesday, 3 August 2021

आजादी मेरी नजर में

 

सुबह से वो बहुत खुश थी I कितने दिन से वह प्रयासरत थी  उन बाल मजदूरों को उस कारखाने से आजाद कराने के लिए I जब से उसे उनके बारे में पता चला,वह हर पल तड़प रही,कोशिशे कर रही की उन बच्चों को उस क़ैद से कैसे मुक्त कराएं I

आखिर उस के अथक प्रयासों और मेहनत का ही नतीजा था कि आज वह बच्चे उस क़ैद से आजाद हो रहे थे I वह जल्द से जल्द उन बच्चों से मिलना चाह रही थे, उनकी आंखों में आजादी की चमक और खुशी देखना चाहती थी I पर ये क्या उनकी आंखों में कोई खुशी नहीं, कोई चमक नहीं  I सबके चेहरे पर एक तनाव, चिंता थी कि अब यहां से कहां जाएंगे I क्यूंकि किसी बच्चे को गरीबी की वजह से उनके मां बाप ने बेचा था, और कोई अनाथ था I कम से कम यहां पेट भरने को खाना और सिर ढकने को छत थी,अब कहां जाएंगे I

सहसा उसको एहसास हुआ कि केवल बेड़ियों से  मुक्त कराना ही आजादी नहीं I सही मायनों में आजादी का मतलब एक ऐसा जहां, एक ऐसा आसमान देना है जहा वो खुलकर अपनी उड़ान भर सके I  नहीं तो इतने बड़े आसाम में पँख फड़फड़ाते कही थक कर गिर नहीं जाये, उनको उनके हिस्से का आसमान देना ही होगा I


और वह एक एनजीओ के साथ मिलकर उनको खुला आसमान,मतलब सही मायने में उनकी आजादी दिलवाने के लिए फिर से लग  गई I