कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा.... कहीं मन नहीं लग रहा l पसंदीदा काम तक उबाऊ लग रहा...ना किसी से बात करने का मन कर रहा बस ऐसा लग रहा अकेले रहूं l चिडचिडाहट, निराशा, गुस्सा, बिना बात आंसूओ का बहना... अवसाद का हर भाव शायद अपने चरम पर था l ईश्वर से कुछ मांगना... उसके पास जाने तक का मन नहीं कर रहा l हालांकि मन में ये भाव आते ही अपराधबोध हुआ डर भी लगा (वो इसलिए भी क्युकि लाख किसी से अपनी भावना छिपा लो पर उससे कहा कुछ छिपा हैँ )सबसे विरक्ति हो पर ईश्वर से विरक्ति कभी ना हो l पर उससे ही नाराज होकर फिर भी उससे ही मांगा की इतना भी परेशान मत कर की तुझसे विश्वास उठने लगे... खुद को धिक्कारा.. कोसा l पर भावनाओं को मेरे डर और अपराध बोध से रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा l बल्कि अंधेरी रात में यह भावनाएं जैसे मुझे और साफ नजर आने लगी l मेरे मन में तूफान ला उस अंधेरी रात को और अंधेरा कर दिया l
पर रात हमेशा कहां रहती है.. सूरज निकलता हैँ.. सुबह आती है और आज भी आयी l रात से सिर्फ सुबह ही तो हुई...मतलब सिर्फ कुछ घंटे l मैं वही थी.. कुछ भी नहीं बदला मुझ में...फिर मेरी वह भावनाएं अब मुझे महसूस क्यों नहीं हो रही l सुबह उठते ही ईश्वर को हमेशा की तरह शुक्रिया कहा.. कही कोई शिकायत...कोई गुस्सा.. कोई अपराध बोध नहीं l साथ में बैठ कर चाय पी.. अकेले नहीं l बेवजह के आंसू गायब थे l गुस्सा, चिडचिडाहट,निराशा कहीं दिखाई नहीं दे रही l मै हैरान रात ज्यादा उजली थी या ये सुबह ज्यादा काली हैँ l क्युकि जो भावनाये रात के अंधेरे में ज्यादा साफ नजर आ रही वो सुबह के सूरज में दिखाई क्यों नहीं दे रही l
हाँ बहुत खुश भले नहीं हूं पर दुखी और निराश भी नहीं हूं l क्या है यह सब... रात से सिर्फ सुबह में भावनाओ में इतना फर्क? जबकि जिंदगी में ना कुछ बदला..ना ही कहीं गया l जब सब कुछ वैसा ही हैँ फिर भावनाओं में इतना बदलाव क्यों l लगा भाव स्थाई नहीं या मेरा मन ज्यादा चंचल है l पर जो भी है अच्छा है स्थाई कुछ भी ना हो वरना जिंदगी बोझिल लगने लगेगी l वैसे भी परिवर्तन ही संसार का नियम है फिर पानी भी एक जगह जमा हो तो सड़ने लगता है इसलिए बेहतर है पानी बस कल कल बहता रहे l