सब वहां खुश दिख रहे थे जाहिर हैँ समारोह हैँ तो वहां कौन खुश नजर नहीं आता l हालांकि नजर आने और खुश होने इन दोनों में बहुत अंतर है l पर जैसे समारोह में खाना, गाना, अच्छे कपड़े, मेकअप ये सब स्वाभाविक हैँ.. समारोह का ही एक हिस्सा हैँ ठीक वैसे ही ख़ुशी को भी स्वाभाविक समझा जाता है.. वो भी समारोह का एक जरुरी हिस्सा होती हैँ l मानो खुश रहना यहाँ ऑप्शन ना हो कर अनिवार्य है l
पर फिर भी मुझे वहां मौजूद तमाम कंपलसरी खुशी में उस एक चेहरे की खुशी जाने क्यों कृत्रिम और ओढ़ी सी लगी l और मैंने मौका मिलते ही उसकी कम्पल्सरी ख़ुशी और मेकअप ओढे चेहरे को हटा उसके उदास मन को टटोला l और जैसे वो उदास मन इसी इंतजार में था अब उसने भी अपने मन को मेरे आगे खोलने में एक पल नहीं लगाया पर हां उसके चेहरे पर पसरी कंपलसरी खुशी उसके चेहरे से जरा देर भी ना हटे इसका उसे बराबर ध्यान था वरना या तो वहां मौजूद सारी आंखें उस एक चेहरे पर टिकी होती या फिर वह अनगिनत सवालों के घेरे में होती और ऐसी किसी भी परिस्थिति का सामना करना सच कहें किसी के लिए भी आसान नहीं होता l
मैंने भी इस वक्त उसके मन को बस इतना भर टटोला जिससे उसके मन की बस परत भर खुल सके और पलकों की आड़ में छिपे उसके आंसूओ को बाहर आने की जरा भी इजाजत ना मिले क्यूको मै उसको सबके आगे असहज नहीं कर सकता थी l
तभी किसी हंसते चेहरे ने मेरा हाथ पकड़ कर वहां से खींच लिया और ना चाहते हुए भी मुझे उसके पास से हटना पड़ा l पर मेरा मन मुड़ मुड़ कर उस उदास चेहरे और उसके भीतर छिपे दर्द पर ही अटका रह गया भले मै सबके साथ हंस रही...बोल रही.. खुश दिख रही बिलकुल जैसे कंपलसरी विषय l फिर भी मेरा मन उस उदास मन के लिए बेचैन हो रहा l मैंने अपने आसपास कुछ खास लोगों से उस उदास मन के एक कोने को थोड़ा सा साझा किया पर एक ओपचारिक सी सहानुभूति के बाद उन्होंने बातों का विषय तुरंत कहीं और मोड़ दिया l जैसे वो कोई उदास मन या दर्द नहीं महज़ बात करने का एक ऐसा विषय हो जिसमे कोई मसाला नहीं l इधर मैं सोच रही कोई कैसे किसी उदास मन को भुला खुशी पर ध्यान दे सकते हैं... कुछ पल क्या एक क्षण भी उसके साथ खड़े होना गंवारा नहीं ... एक मैं जो उस समारोह में ही नहीं अभी तक उस उदास मन के साथ जैसे वही खड़ी हूं l
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