Jindagi ek unsuljhi paheli

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Saturday, 14 February 2026

चंचल मन

 कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा.... कहीं मन नहीं लग रहा l पसंदीदा काम तक उबाऊ लग रहा...ना किसी से बात करने का मन कर रहा बस ऐसा लग रहा अकेले रहूं l चिडचिडाहट, निराशा, गुस्सा, बिना बात आंसूओ का बहना... अवसाद का हर भाव शायद अपने चरम पर था l ईश्वर से कुछ मांगना... उसके पास जाने तक का मन नहीं कर रहा l हालांकि मन में ये भाव आते ही अपराधबोध हुआ डर भी लगा (वो इसलिए भी क्युकि लाख किसी से अपनी भावना छिपा लो पर उससे कहा कुछ  छिपा हैँ )सबसे विरक्ति हो  पर ईश्वर से विरक्ति कभी ना हो l पर उससे ही नाराज होकर  फिर भी उससे ही मांगा की इतना भी परेशान मत कर की तुझसे विश्वास  उठने लगे... खुद को धिक्कारा.. कोसा l पर  भावनाओं को मेरे डर और अपराध बोध से रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा l बल्कि अंधेरी रात में यह भावनाएं जैसे मुझे और साफ नजर आने लगी l मेरे मन में तूफान ला उस अंधेरी रात को और अंधेरा कर दिया l 


पर रात हमेशा कहां रहती है.. सूरज निकलता हैँ.. सुबह आती है और आज भी आयी l रात से सिर्फ सुबह ही तो हुई...मतलब सिर्फ कुछ घंटे l मैं वही थी.. कुछ भी नहीं बदला मुझ में...फिर मेरी वह भावनाएं अब मुझे महसूस क्यों नहीं हो रही l सुबह उठते ही ईश्वर को हमेशा की तरह शुक्रिया कहा.. कही कोई शिकायत...कोई गुस्सा..  कोई अपराध बोध नहीं l  साथ में बैठ कर चाय पी.. अकेले नहीं l बेवजह के आंसू गायब थे l गुस्सा, चिडचिडाहट,निराशा कहीं दिखाई नहीं दे रही l मै हैरान रात ज्यादा उजली थी या ये सुबह ज्यादा काली हैँ l क्युकि जो भावनाये  रात के अंधेरे में ज्यादा साफ नजर आ रही वो सुबह के सूरज में दिखाई क्यों नहीं दे रही l 


हाँ बहुत खुश भले नहीं हूं पर दुखी और निराश भी नहीं हूं l क्या है यह सब... रात से सिर्फ सुबह में भावनाओ में इतना फर्क? जबकि जिंदगी में ना कुछ बदला..ना ही कहीं गया l जब सब कुछ वैसा ही हैँ फिर  भावनाओं में इतना बदलाव क्यों l लगा भाव  स्थाई नहीं या मेरा मन ज्यादा चंचल है l पर जो भी है अच्छा है स्थाई कुछ भी ना हो वरना जिंदगी बोझिल लगने लगेगी l वैसे भी परिवर्तन ही संसार का नियम है फिर पानी भी एक जगह जमा हो तो सड़ने लगता है इसलिए बेहतर है पानी बस कल कल बहता रहे l

उदास मन

 सब वहां खुश दिख रहे थे जाहिर हैँ समारोह हैँ तो वहां  कौन खुश नजर नहीं आता l हालांकि नजर आने और खुश होने इन दोनों में बहुत अंतर है  l पर जैसे समारोह में खाना, गाना, अच्छे कपड़े, मेकअप ये सब स्वाभाविक हैँ.. समारोह का ही एक हिस्सा हैँ ठीक वैसे ही ख़ुशी को भी स्वाभाविक समझा जाता है.. वो भी समारोह का एक जरुरी हिस्सा होती हैँ l मानो खुश रहना यहाँ ऑप्शन ना हो कर अनिवार्य है l


पर फिर भी मुझे वहां मौजूद तमाम कंपलसरी खुशी में उस एक चेहरे की खुशी जाने क्यों कृत्रिम और ओढ़ी  सी लगी l और मैंने मौका मिलते ही उसकी कम्पल्सरी ख़ुशी और  मेकअप ओढे चेहरे को हटा उसके उदास मन को टटोला l और जैसे वो उदास मन इसी इंतजार में था अब उसने भी अपने मन को मेरे आगे खोलने में एक पल नहीं लगाया  पर हां उसके चेहरे पर पसरी कंपलसरी खुशी  उसके चेहरे  से जरा देर भी ना हटे  इसका उसे बराबर  ध्यान था वरना या तो वहां मौजूद सारी आंखें उस एक चेहरे पर टिकी होती या फिर वह अनगिनत सवालों के घेरे में होती और ऐसी किसी भी परिस्थिति का सामना करना सच कहें किसी के लिए भी आसान नहीं होता l 


मैंने भी इस वक्त उसके मन को बस इतना भर टटोला जिससे उसके मन की बस परत भर खुल सके और  पलकों की आड़ में छिपे उसके आंसूओ को बाहर आने की जरा भी इजाजत  ना मिले क्यूको मै उसको सबके आगे असहज नहीं कर सकता थी l 


तभी किसी हंसते चेहरे ने मेरा हाथ पकड़ कर वहां से खींच लिया और ना चाहते हुए भी मुझे उसके पास से हटना पड़ा l पर मेरा मन मुड़ मुड़ कर  उस उदास चेहरे और उसके भीतर छिपे दर्द पर ही अटका रह गया भले मै सबके साथ हंस रही...बोल रही.. खुश दिख रही  बिलकुल जैसे कंपलसरी विषय l फिर भी मेरा मन उस उदास मन के लिए बेचैन हो रहा l मैंने अपने आसपास कुछ खास लोगों से उस उदास मन के एक कोने को थोड़ा सा साझा किया पर एक ओपचारिक सी सहानुभूति के बाद उन्होंने बातों का विषय तुरंत  कहीं और मोड़ दिया l जैसे वो कोई उदास मन या दर्द नहीं महज़ बात करने का एक ऐसा विषय हो जिसमे कोई मसाला नहीं l इधर मैं सोच रही  कोई कैसे किसी उदास मन को भुला खुशी पर ध्यान दे सकते हैं... कुछ पल क्या एक क्षण भी उसके साथ खड़े होना गंवारा नहीं ... एक मैं  जो  उस समारोह  में ही  नहीं अभी तक उस उदास मन के साथ जैसे वही खड़ी हूं l