हॉल में उपस्थित सारे लोग गिटपिट अंग्रेजी में बोल कर अपनी बौद्धिकता का प्रदर्शन कर रहे थे I अंग्रेजी तो उनके मुंह से ऐसे निकल रही थी,मानो यही उनकी मातृभाषा हो I अंग्रेजी बोलना मात्र ही जैसे उनकी बौद्धिकता का प्रमाण पत्र हो I
हिंदी बोलने वालों की यहां पर कोई जगह नहीं थी I एक पल को वो ठिठका, सहमा,क्या यहां अपनी बात रखना सही होगा,यह समझ भी पाएंगे उसकी बात I पर उसको अपने ऊपर पूर्ण विश्वास था, यकीन था खुद के ऊपर I
और जैसे ही उसने बोलना शुरू किया, एक पल को तो लोग उसको हिकारत से देखने लगे I मानो यह कोई अलग ग्रह से आया कोई अनपढ़ गँवार हो I वहां उपस्थित लोग ऐसा अभिनय कर रहे जैसे उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा I पर वह ना ठिठका और ना झिझका I एक-एक शब्द को बहुत ही सधे अंदाज में बोल रहा, और अपनी बात को लोगों के सामने पूरे तर्क और वितर्क के साथ रख रहा I
धीरे-धीरे जो लोग अभी तक अंग्रेजी बोलने वालों को ही बौद्धिक समझ रहे, उसकी बौद्धिकता का लोहा मानने लगे, और उसकी वाहवाही करने लगे I धीरे-धीरे जो लोग उससे कतरा रहे, उसके चारों और उसको सुनने वालों की भीड़ जमा हो गई I और वह अभी भी अपनी बात पूर्ण आत्मविश्वास के साथ हिंदी में रख रहा था I
उसने अपनी बात के साथ लोगो को ये भी समझा दिया की भाषा किसी की बौद्धिकता का प्रमाण पत्र नहीं होती I
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