सुबह पूरी तरह आँख भी नहीं खुली की उसकी उनिंदीं नजऱ अपने बगल में गयी... जाहिर हैँ इस वक्त तक उसकी अनुपस्थिति उसे अपेक्षित थी.. तभी बगल में रखे तकिये पर सहसा हाथ चला गया काश यह हाथ तकिये की जगह रात को उसके आँसूओ पर चला जाता l पर उस वक़्त वो वहाँ मौजूद थी और अब ज़ब वो नहीं हैँ यही वजह हैँ उसका हाथ तकिये पर गया l शायद इसलिए कहते हैँ किसी की मौजूदगी में उसे अपना कंधा दो मरने के बाद तो सब देते हैँ l रात को जिन आँसूओ की उसने उपेक्षा की थी उस उपेक्षा के निशान गीलेपन के रूप में उसे उसके तकिये पर साफ महसूस हो रहे थे l सहसा उसके प्रति कोमल अहसास उसके मन में जागे और खुद पर धिक्कार हुआ की जो नमी उसे अपने सीने पर महसूस करनी चाहिए थी वो इस तकिये पर कर रहा हैँ l अपने अहम् और अकड़ में रात को उससे पानी के लिए भी नहीं पूछा... बेड के बगल में रखी पानी की भरी बोतल देख उसे खुद पर गुस्सा आया l आलस के कारण वो खुद कहा कभी पानी पीती हैँ जब तक वो जबरदस्ती ना करें l दिल खुद को अपने व्यवहार के लिए धिक्कारने ही वाला था पर तभी अहम् ने फिर से उसके भावो को गर्त में डाल दिया l नींद से पूरी तरह जग चुका था तो दिमाग़ में नये नये खयाल भी जगने लगे l आज घर में कुछ नॉर्मल तो नहीं होगा...रात को उन दोनों के बीच जो इतना एबनॉर्मल हुआ... छोटी सी बात शुरू हो कहां से कहां तक पहुंच गई... दोनों के बीच कुछ नार्मल बचा ही नहीं l फिर इतना एब्नार्मल होने पर कहां अब कुछ नॉर्मल होने की गुंजाइश बची है l
पर तभी बाहर जो खामोशी,सन्नाटे की उसने अपेक्षा की थी वो सन्नाटा ना तो उसे सुनाई दिया ना कहीं भी महसूस ही हुआ l बाहर की सब आवाजे वो सुन पा रहा था... जो उसकी अपेक्षा के विपरीत ही थी l बच्चे आज भी रोज की तरह मम्मी से अपनी बेशुमार फरमाशो को पूरा कराने में लगे थे और उनकी मम्मी भी उन्हें वही प्यार भरे उलाहने देती उसी ममता और खुशी से उनकी फरमाइशो को पूरा करने में जुटी थी... रात को उन दोनों के बीच का जो गुस्सा था... तनाव था उसका हल्का सा अंश भी उसकी ममता में उसे घुला हुआ जरा भी महसूस नहीं हुआ l उसकी हैरानी ख़तम भी नहीं हुई की मम्मी की वही चिरपरिचित आवाज,
"बहू बच्चों को स्कूल भेजने के बाद मेरे लिए थोड़ा गुनगुना पानी कर देना"
"जी मम्मी" की वही संक्षिप्त आवाज जिसमें कोई ठंडापन, कोई खामोशी, कोई उदासी,नाराजगी कुछ भी तो नहीं दिख रही थी... तभी पापा ने फल की थैली पकड़ाते हुए कहा,
" ले बेटा इसे धो कर फ्रिज में रख देना",
" जी पापा "
की वही हमेशा की तरह सधी और लिहाज भरी आवाज l क्या वाकई वो नार्मल हो गयी..अगर बाहर सब नॉर्मल है तो रात को जो इतना एब्नार्मल हुआ मतलब वो सब भूल गई l पर कैसे...जो कुछ हुआ इतनी जल्दी भूलने की बात तो नहीं हैँ l
इस सामान्य को वो स्वीकार नहीं कर पा रहा था इसलिए अपनी स्वीकृति पर मोहर लगाने के लिए वो सोच कर बैठा था कि शायद आज चाय किसी और के हाथो भिजवाएगी या फिर आए ही ना l और अगर वो खुद चाय के साथ आ भी गयी तो रात की शिकायतो, तानो, नाराजगी की बरसात जो थोड़ी देर नींद ने थाम ली थी (हाँ ये नींद एकतरफ़ा ही थी उसने तो निश्चिंत ही आँसूओ के साथ रात काटी होगी) दोनों के आमने सामने होते ही फिर बरसने लगेगी l
वो मन ही मन कल्पनाओ के घोड़े दौड़ा रहा... अगर उसने कुछ कहा तो वो भी चुप नहीं रहेगा l तभी उसके मन के घोड़े को लगाम लगाती वो बिखरे बालों को बेतरतीबी से बांधे हुए चाय और साथ में वही उसकी सेहत को ध्यान में रखते हुए दो बिस्किट लेकर आई l चाय, बिस्किट्स साथ में वो खुद...क्या वाकई सब नार्मल हो गया... पर इतनी जल्दी... कैसे?
ना चेहरे पर शिकन, ना उदासी.. हां मुस्कान थोड़ी कम जरूर लग रही थी या जबरदस्ती ओढ़ रखी थी या फिर ये भी उसका वहम था उसके उसी एबनार्मल अपेक्षित व्यवहार की तरह l हां रात के बहे अनगिनत आंसू अब भी आंखों के नीचे सूजन के रूप में वो चोर नजरों से देख पा रहा था.. जिन्हे वो भी नजरें चुरा कुशलता से छिपाने का हरसंभव प्रयास कर रही थी l वो नजरें इसलिए भी नहीं मिला रही थी क्युकी वो जानता था नजरें मिलते ही उसके आंसू उसका कहा नहीं मानने वाले और वो उन्हें रात की तरह इतनी जल्दी फिर से उपेक्षित नहीं कर सकती... फिर अभी इनके लिए उसके पास समय भी कहा l
उसने झिझकते हुए उसके हाथ से चाय का कप पकड़ा...दोनों पूरी कोशिश में थे नजरें ना मिले l पर "मन जिसे नजरअंदाज करता हैँ ये नजरें रह रह कर आ वही ठहरती हैँ"... वही उन दोनों के बीच हुआ... जैसे ही दोनों की नजरे टकराई उसकी आँखों में पसरी हैरानी उसने महसूस कर ली (वैसे भी उसके मन में भाव बाद में आये पढ़ वो पहले लेती हैँ... इस मामले में हमेशा उससे आगे ही रही... और आगे पीछे की तो बात क्या... वो तो इसमें उसका साथ किसी भी जगह अपेक्षित ही नहीं करती) उसकी हैरानी का जवाब उसने आँखों से ही दिया... वैसे भी संवाद की अभी कुछ देर तो कोई गुंजाईश बची नहीं .. कम से कम जब तक बहुत जरुरत ना हो l उसकी आँखो ने बोलना शुरू किया,
" हैरान मत हो हम दोनों के बीच में जो कुछ भी एबनॉर्मल था या हुआ अगर वह खुद के साथ इस कमरे से बाहर ले जाती तो हर जगह हमारे रिश्ते के एब्नार्मल निशान छप जायेंगे... तुम्हारे घर में...बच्चों में.. मम्मी पापा में l और वह कभी नहीं चाहती अपने बच्चों को हमारे तनाव के कारण सहमा देखे... उनसे उनकी सहज़ मासूम मुस्कान छीने... मम्मी पापा या घर में किसी को भी हमारे रिश्ते में पसरी कमजोरी की आहट नहीं सुना सकती l इसलिए एबनॉर्मल से नॉर्मल होना उसकी कोई चॉइस नहीं है... उसने चुना नहीं बल्कि यह तो उसे करना पड़ा l इसके अलावा उसके पास कोई ऑप्शन भी तो नहीं था l ये कोई कॉलेज का ऑप्शनल विषय नहीं जिसे पढ़ने की उसको कोई चॉइस मिले... ये तो जिंदगी का कंपल्सरी विषय हैँ जिसे ना चाहते भी उसे पढ़ना है l वरना अगर कॉलेज की तरह उसे चॉइस मिलती तो वह बिखरे बाल,सूजी आँखे,उदासी, मातम, शिकायतों के तमाम पुलिंदे...रात की वो सारी एब्नार्मेलिटी को अब भी एक कोने में ज्यो का त्यों ले कर बैठी रहती l पर कहा ना ये कॉलेज नहीं जिंदगी हैँ जहाँ उसके पास चॉइस नहीं l तभी बाहर से आवाज आयी,
"मम्मी टिफ़िन दो हमारी बस आ गयी ",
और वो "आयी "की आवाज लगाती बाहर निकल गयी उसको वैसे ही हैरानी में छोड़ कर... हाथ में पकड़ी चाय पर पपड़ी जम चुकी थी पर रात की अबनॉर्मेलिटी से सुबह की नॉर्मेलिटी उसे अब भी हजम नहीं हो रही थी l
रीशा गुप्ता ✍🏻✍🏻
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