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Tuesday, 16 December 2025

नीर और नारी

 नीर और नारी 


नीर (पानी) और नारी (स्त्री) या फिर नारी (स्त्री) और नीर (पानी),

कैसे भी लिख लो या फिर कैसे भी तुम पढ़ लो,

क्या फर्क पड़ता है...क्युकी कहानी या फिर कह लो किस्मत तो दोनों की लगभग एक जैसी ही  है,

जैसे पानी का भले खुद का कोई रंग ना होता,

पर जिसमें मिल जाता है.. उस  रंग में  घुल कर उस रंग का ही हो कर वो रह जाता  है,

स्त्री का भी कौन सा कोई रंग (घर )होता है,

पर जिस घर जाती है  उस रंग में घुल खुद के अस्तित्व को तक़रीबन मिटा ही देती है,

बिन पानी सब सून है... जल है तो कल है,

वैसे ही स्त्री है तो सृष्टि है,महकता चहकता हर घर आंगन है,

पानी के बिना जीवन नहीं जानते हुए भी दिन प्रतिदिन उसका दोहन हो रहा,

स्त्री अंकुर है नव जीवन का.. बावजूद उसके  कोख में ही हर रोज उसको मारा जा रहा,

दोनों के ही मोल को किसी ने नहीं समझा ,

अनमोल है दोनों पर किसने ये जाना,

शायद इसलिए  दोनों ने एक दूसरे के दर्द को समझा,

तभी तो पानी  स्त्री की आंख में समा गया,

और स्त्री ने भी पानी को खुद की आंखों में बसा लिया l

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