घर की सार संभाल करते ध्यान घर की टेरिस पर गया l लगा फर्श पर कुछ गिरा पड़ा है l देखा कोई पतंग कट कर गिरी है l इस वक्त पतंग...अभी तो पतंग का समय कहां है l फिर ध्यान आया बच्चों के लिए कब कोई तय दिन और समय होता है दिवाली के बाद से ही उनका पतंग का मौसम चालू l हाँ मुझे अजीब लगा क्युकी अब मेरे बच्चों का बचपन जो बीत गया... वैसे भी आजकल बचपन समय से पहले बीत जाता है l वरना कुछ साल पहले मेरे बच्चे की भी ऐसी ही पतंगे आसमान में टकी रहती थी और अगर ऐसी कोई पतंग कट कर आये तो भले हाथ में उड़ने वाली पतंग छोड़ दे... घर में अनगिनत पतंग पड़ी हो पर उस कटी पतंग सा स्वाद कही नही मिलता l और उस स्वाद को सिर्फ वही नहीं चखता उसके साथ मैं भी चखती l टेरेस पर पड़ी उस पतंग को देख एक पल को मन खुश हुआ ही था पर अचानक वह पतंग बेमानी और बेकार लगने लगी l लगा किसको दूंगी यह पतंग क्योंकि एक बेटे ने तो अपने करियर को उड़ान देने के लिए अपना एक अलग आसमान बना लिया जहां इन पतंगो की कोई जगह नहीं या फिर मज़बूरी है की अगर पतंगो को जगह दे दी तो उसका बनाया आसमान कही छोटा ना पड़ जाये l और जो बच्चे यहाँ है उन्होंने खुद को एग्जाम के प्रेशर और मोबाइल, गेजेट्स की दुनिया में डूबो कर अपने आसमान को इस हद तक छोटा कर लिया की पतंगों की वहां नाम मात्र की भी जगह नहीं l
सच जो चीज किसी समय हमे ख़ुशी देती है पर किसी दूसरे पल बेमानी और बेकार होती है तो ख़ुशी या दुख चीजों से नहीं मन की अवस्था और वक्त पर निर्भर करती है l
खैर उस कटी पतंग को उसका सही आसमान मिल जाये इस आशा में मैंने घर में काम करने वाली सहायिका से कहा,
" तुम ले जाओ यह पतंग तुम्हारे बच्चे उड़ा लेंगे ",
वो हंसते हुए बोली,
"पतंग कौन उडाता हैं अब...इस मोबाइल से फुर्सत मिले तब ना",
ये कहते उस माँ की खोखली हसीं का दर्द मैं बिना मुश्किल के महसूस कर रही थी l करती भी कैसे ना ये दर्द एक नहीं वहां मौजूद दो माँ का जो था l
सच जहां किसी बच्चे ने अपनी उड़ान के लिए एक अलग आसमान चुन लिया तो कुछ ने मोबाइल में अपने आकाश को संकुचित कर लिया l फिर मां का आकाश तो होते ही उसके बच्चे है उनके होने से उसका आसमान रंग बिरंगा वरना वीरान और सूना l
अचानक आसमान पर नजर गई कुछ एक पतंगे अभी भी आसमान में उड़ रही थी l शायद यह पतंगे उस बचपन की होगी जहाँ करियर का दबाव अभी पंहुचा नहीं या मोबाइल ने उनके आसमान को संकुचित नहीं किया l भारी मन से उस पतंग को उठा अंदर आ गयी और सोचने लगी,
भले वक्त पर सब अपने अलग-अलग आकाश बना ले पर उस विधाता ने जो एक आकाश दिया उसको कभी सूना ना पड़ने दे l पर इसके लिए तो सबको कुछ पल तो ऐसे बनाने होंगे जब अपने अपने बनाये आकाश को छोड़ कर सिर्फ उस एक आकाश की और देखना होगा l
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