Jindagi ek unsuljhi paheli

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Sunday, 14 December 2025

बचपन

“बेटा थोड़ी मैग्गी मुझे भी मिलेगी क्या? रोज  खाने में खिचड़ी खाकर ऊब गया.. थोड़ा मुँह स्वाद हो जाएगा l  बहू से बोल दो चम्मच मैगी मुझे भी दे दे ",


रसोई में आती मैगी की महक महसूस कर किसी छोटे बच्चे की तरह जगदीश जी अपने बेटे संजय से अनुरोध करने लगे l उनके अनुरोध में बिल्कुल बच्चों जैसी आकुलता छलक लग रही थी जिसे देख संजय भावुक हो गया l 


संजय ने रसोई में आकर कुछ कहने की बजाय एक नजर चार्वी को देखा... क्युकी उसे मालूम था अब तक चार्वी ने बाहर पापा और बेटे की बातें तो सुन ही ली थी और उसका अंदाजा बिलकुल सही निकला l पैन में चढ़ी मैगी में मसाला डालते हुए चार्वी बड़बड़ करती बोली,


" अरे तुम्हारे पापा क्या बच्चे हैं जो इस उम्र में भी मैगी खाएंगे l  कुछ तो अपनी उम्र का लिहाज करें कभी बच्चों के पिज्जा पर नजर  तो कभी बच्चों की आइसक्रीम पर",


संजय को डर था कही चार्वी की बात पापा के कान में ना पड़ जाये l  चार्वी से धीरे बोलने का इशारा कर वह बात संभालते हुए बोला,


"अरे  नाराज क्यों होती हो तुम तो जानती हो बुढ़ापा इंसान का दूसरा बचपन ही तो होता है.. दे दो जरा सी मैग्गी",


चार्वी  ने अपने आठ साल के बेटे को मैगी की प्लेट पकड़ाई और संजय को एक कटोरी में दो चम्मच मैगी देते हुए बोली,


" बस इतनी ही है सार्थक के लिए बनायीं थी उसके हिस्से की निकाल कर दी है l खुद का खाना तो भाता नहीं मेरे बच्चे के खाने पर नजर रहती है",


इधर सार्थक सब सुन रहा था l आए दिन वह घर में ऐसी बातें सुनता था जो उसके अवचेतन मन में बैठती जा रही थी जिससे उसका मासूम बचपन धीरे धीरे परिपक्व होता जा रहा था l जिसे संजय ने भी महसूस किया पर कुछ कर नहीं सकता l जैसे ही चार्वी अपने कमरे में गई उसने अपनी मम्मी की नजर बचाकर अपनी प्लेट में से थोड़ी मैग्गी दादाजी की प्लेट में दे दी l उस मैग्गी को देख दादाजी की नजरों में  और चमक आ गई l  वह मैगी के लंबे लच्छे  बनाते हुए उसे छोटे बच्चे की तरह सुडकने लगे  जिसे देख सार्थक को भी हसीं आ गयी l


इधर संजय रसोई से सब देख रहा था अपने बेटे  के बचपन की परिपक्वता और पापा के बुढ़ापे का बचपन देख कर उसकी आँखे छलछला आयी l


रीशा गुप्ता ✍🏻✍🏻

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