Jindagi ek unsuljhi paheli

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Wednesday, 20 October 2021

लक्छ्मी जी कोठी वालों की

 

एक झोपड़े में झुमकी,

'हे लक्छमीजी तुम इस दिवाली हमारे झोपड़े में  आओ ना,सामने  की कोठी में ख़ुशी  के पास तो तुम पहले से ही हो I मुझे भी तुम्हारी थोड़ी जरुरत हैँ I. प्लीज इस बार मेरी झोपडी में आओ 🙏🙏'I

.झुमकी की माँ,

'बेटी लक्छमीजी  इस बार भी खुशी की कोठी में ही जाएंगी',

'पर क्यों मां',

'क्यूंकि बेटा लक्छमीजी भी पैसे वालों के ही घर जाती हैँ I तू तो इस  गुड़िया से खेल Iआज ख़ुशी की कोठी में दिवाली की सफाई में मिली, वो फ़ेंक रहे थे, मै मेरी झुमकी के लिए ले आयी',

टूटी गुड़िया को देख झुमकी लछमीजी को भूल कर गुड़िया से खेलने लगी I उसके चेहरे पर जो ख़ुशी थी वो तो ख़ुशी के चेहरे  पर महंगी गुड़िया से भी नहीं आती I अब उसको कोई दुख नहीं था अगर इस बार भी लक्छ्मी जी  सामने खुशी की कोठी में जाएंगी, उसको तो खेलने को कीमती गुड़िया जो मिल गयी थी, जो शायद उसे लक्छमीजी  से भी ज्यादा ख़ुशी दे रही थी I

Risha gupta at 07:29
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