खुल कर खेलने तो दो🤸♂️🤸♀️🤼♂️🤾♂️🤾♀️
आजा अतुल खेलने चलें... नहीं मेरी तो टेनिस क्लास है... अरे अपना क्रिकेट मैच है दूसरी गली के बच्चों के साथ... एक दिन मत जा टेनिस क्लास.... नहीं मम्मी डाँटेंगी... फीस जाती है... और कहेंगी क्या आवारा बच्चों की जैसी खेलते हो....
आजा प्रिया घर घर खेले... नहीं मेरी तो डांस क्लास है... अरे आजा बड़ा मजा आएगा... मेरी और फ्रैंड्स भी आ रही है... मम्मी प्लीज् आज मैं घर घर खेल लू.. No..go to your dance class... dont waste your time in such stupid games.
ऊपर जो मैंने लिखा आज ये आम बात है....हर घर में यही हाल है... बच्चों की कभी कौन सी क्लास... कभी कौन सी... और अगर हॉबी क्लास नहीं हुई तो ट्यूशन क्लास.. बच्चों को हमने मशीन बना दिया... सुबह स्कूल... आते से ही ट्यूशन... फिर हॉबी क्लासेस... बच्चे अपने मन से अपने बनाये खेल तो खेलते ही नहीं है.. खेलने की भी क्लासेस....वो भी हमारी पसंद के खेल.
पर कभी सोचा इन क्लासेस में बच्चे अपने मन से खेल सकते हैं... नहीं... वहां उनको अपने कोच के इंस्ट्रक्शंस, रूल फॉलो करने होते हैं... उनके अकॉर्डिंग खेलना... उनके डिसीजन मानना... याद कीजिए हम लोग जब खेलते थे.. हॉबी क्लासेस में नहीं... अपने फ्रेंड्स के साथ... घर में, गलियों में, पार्क में तो वहां रूल्स भी हमारे...इंस्ट्रक्शंस भी हमारे.. और लड़ाई होने पर solution भी हमारे... इससे हम लोगों में डिसीजन पावर, सेल्फ डिपेंड और ना जाने क्या क्या सीखने को मिलता था... और उस खेल में जो मजा होता था... क्यूंकि वहां कोई कोच नहीं होता था हमें इंस्ट्रक्शंस देने वाला.. हम हमारे गेम्स बनाते.. और खेलते.. उसका मजा ही अलग था...क्यूंकि नियम भी हमारे.. खेल भी हमारे.. और खिलाने वाले भी हम..और एक बात यहाँ समय की कोई सीमा नहीं.. जब मन तब खेलो.. कितनी भी देर खेलो... घर तब जाना जब लगे की अब घर पर डांट पड़ेगी.
पर आज बच्चों को हमने एक कठपुतली बना दिया... वह हर जगह दूसरों को फॉलो करते हैं...
तो कहां से बनाएंगे वह खुद के रूल्स... कहां से लेंगे खुद के decisions.. उनको एक बार खुलकर खेलने तो दो अपनी गली में... अपने घर में... देखना उनके चेहरे पर जो खिलखिलाहट दिखेगी... जो मस्ती, बेपरवाही दिखेगी... वह कोई हॉबी क्लासेस में दिख जाए तो बता देना...वहां तो वो रोबोट के जैसे होते है.. जो कोच के रूल्स फॉलो करते है.
माना आज कम्पटीशन का टाइम है पर अगर weekdays में नहीं तो वीकेंड पर तो उनको खेलने दो... उसका कितना मजा बच्चों को आएगा... और उनके चेहरे पर जो सुकून आएगा... वह सुकून आपके चेहरे पर भी देखने को मिलेगा... पर एक बार इसके लिए उनको खुल कर खेलने तो दो. 🙏
आजा अतुल खेलने चलें... नहीं मेरी तो टेनिस क्लास है... अरे अपना क्रिकेट मैच है दूसरी गली के बच्चों के साथ... एक दिन मत जा टेनिस क्लास.... नहीं मम्मी डाँटेंगी... फीस जाती है... और कहेंगी क्या आवारा बच्चों की जैसी खेलते हो....
आजा प्रिया घर घर खेले... नहीं मेरी तो डांस क्लास है... अरे आजा बड़ा मजा आएगा... मेरी और फ्रैंड्स भी आ रही है... मम्मी प्लीज् आज मैं घर घर खेल लू.. No..go to your dance class... dont waste your time in such stupid games.
ऊपर जो मैंने लिखा आज ये आम बात है....हर घर में यही हाल है... बच्चों की कभी कौन सी क्लास... कभी कौन सी... और अगर हॉबी क्लास नहीं हुई तो ट्यूशन क्लास.. बच्चों को हमने मशीन बना दिया... सुबह स्कूल... आते से ही ट्यूशन... फिर हॉबी क्लासेस... बच्चे अपने मन से अपने बनाये खेल तो खेलते ही नहीं है.. खेलने की भी क्लासेस....वो भी हमारी पसंद के खेल.
पर कभी सोचा इन क्लासेस में बच्चे अपने मन से खेल सकते हैं... नहीं... वहां उनको अपने कोच के इंस्ट्रक्शंस, रूल फॉलो करने होते हैं... उनके अकॉर्डिंग खेलना... उनके डिसीजन मानना... याद कीजिए हम लोग जब खेलते थे.. हॉबी क्लासेस में नहीं... अपने फ्रेंड्स के साथ... घर में, गलियों में, पार्क में तो वहां रूल्स भी हमारे...इंस्ट्रक्शंस भी हमारे.. और लड़ाई होने पर solution भी हमारे... इससे हम लोगों में डिसीजन पावर, सेल्फ डिपेंड और ना जाने क्या क्या सीखने को मिलता था... और उस खेल में जो मजा होता था... क्यूंकि वहां कोई कोच नहीं होता था हमें इंस्ट्रक्शंस देने वाला.. हम हमारे गेम्स बनाते.. और खेलते.. उसका मजा ही अलग था...क्यूंकि नियम भी हमारे.. खेल भी हमारे.. और खिलाने वाले भी हम..और एक बात यहाँ समय की कोई सीमा नहीं.. जब मन तब खेलो.. कितनी भी देर खेलो... घर तब जाना जब लगे की अब घर पर डांट पड़ेगी.
पर आज बच्चों को हमने एक कठपुतली बना दिया... वह हर जगह दूसरों को फॉलो करते हैं...
तो कहां से बनाएंगे वह खुद के रूल्स... कहां से लेंगे खुद के decisions.. उनको एक बार खुलकर खेलने तो दो अपनी गली में... अपने घर में... देखना उनके चेहरे पर जो खिलखिलाहट दिखेगी... जो मस्ती, बेपरवाही दिखेगी... वह कोई हॉबी क्लासेस में दिख जाए तो बता देना...वहां तो वो रोबोट के जैसे होते है.. जो कोच के रूल्स फॉलो करते है.
माना आज कम्पटीशन का टाइम है पर अगर weekdays में नहीं तो वीकेंड पर तो उनको खेलने दो... उसका कितना मजा बच्चों को आएगा... और उनके चेहरे पर जो सुकून आएगा... वह सुकून आपके चेहरे पर भी देखने को मिलेगा... पर एक बार इसके लिए उनको खुल कर खेलने तो दो. 🙏
Yes di..you r right..superb titel
ReplyDeleteThanks a lot ritu🙏🙏😘😘
ReplyDeleteVery good Di... saari mom's ki soch aisi ho jaye to bachcho ki khushiya double aur unka over all devlopment bht achche se ho jayega.
ReplyDeleteEvery parents should learn from it.
Bht achche se samjhaya hai aapne..
Keep it up.👍👍👍
Such main sonu...and thanks a lot🙏🙏
DeleteRight badi mummy
ReplyDeleteBachche jab tak koi decision lena nahi sikhenge tab tak aage nahi badh payenge
Right betu😘😘😘
ReplyDeleteबिल्कुल सही लिखा है आपने आजकल पहले वाली बातें कहां है उन पर दबाव भी तो माता-पिता डालते हैं इसमें बच्चों का क्या दोष.
ReplyDeleteबिल्कुल सही लिखा है आपने इस बारे में माता-पिता को जरूर सोचना चाहिए.
ReplyDeleteBilkul sahi👍
ReplyDeleteVery true di . Bachpan to bina bandisho aur rules ke hona chahiye.again very beautifully written di 👍👍👌👌👌👌
ReplyDeleteReally...and thanks a lot🙂👍
ReplyDeleteAgain nice thoughts nice subject nice opinion well said
ReplyDeleteThanku🙂
ReplyDeleteAbsolutely true
ReplyDelete🙂🙏👍
ReplyDeleteYou r absolutely right di
ReplyDeleteHum sbhi shayad bachchon ko unka bachpan jine nhi dete
I am trying to follow ur opinion.
Well written 👏
Thanku so much cheenu 😘🙏
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