Jindagi ek unsuljhi paheli

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Monday, 30 November 2020

मासी माँ की ही जैसी

 मासी माँ तो नहीं होती,

पर माँ से कम भी नहीं  होती!

याद हैँ... कल की ही वो  बात ,

जब हो जाती तू मम्मी से नाराज,

तो सबसे पहले आती मेरे ही पास,

करती ढेरो उनकी शिकायते, लेके बैठ जाती उनके दिए उलहाने,

मैं चुपचाप तुझको सुनती, प्यार से तुझे समझाती,

यू ही नहीं डांटती वो, तेरे भले के लिए ही कहती हैँ वो!

फिर तू नहीं करती मुझसे भी बात,

जब देखो लेती मम्मी का पक्ष,

क्यों नहीं सुनती मुझको निष्पक्ष!

फिर वो अगले ही पल तेरा मान भी जाना,

सब कुछ भूल बेवजह खिलखिलाकर मुस्कुराना!

सच छोटी सी ही समझा तुझे, कभी सोचा ही नहीं,

हो जाएगी इक दिन इतनी बड़ी,भेजना पड़ेगा अपने से इतना दूर!

सच बताऊ तो दिल कपकपा रहा हैँ, आँखे डबडबा रही हैँ,

कैसे जी पाऊँगी तेरे बिन,

दिला पाऊँगी इस दिल को यकीन!

पर हूँ तेरे लिए बहुत ही खुश,

तेरी नयी दुनिया बन जाये तेरे सपनो की दुनिया,

जहा पूरा हो तेरा हर इक ख्वाब,

इन आँखों  में बस ख्वाब और ख़ुशी हो,

आँसू हो तो बस ख़ुशी के हो!

दिल से दुआ हैँ ये मेरी तुझको,

तू जहा भी जाये, तेरे इन कदमो में फूलो की बरसात हो!

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